Как отчистить слюну собаки? - Ан-Ниса - Мусульманский женский портал

Как отчистить слюну собаки?

Вопрос:

У меня вопрос о собачьей слюне. Известно, что в ханафитском мазхабе нужно промыть загрязненное место три раза, но ведь струей водопроводной воды или воды из душа мы можем легко удалить грязь и с одного раза. И еще такой вопрос – если меня облизала собака, а я находился в состоянии джунуб (осквернения), достаточно ли мне искупаться, чтобы удалить слюну или нужно все-таки промыть это место три раза? Если собака оближет мне руку, ведь одного раза достаточно, чтобы смыть ее.

Ответ:

Ассаляму алейкум ва рахматуллахи ва баракятух!

Ханафитские факихи (ученые) советовали промыть грязное место трижды, чтобы нечистота была удалена наверняка. Если же человек уверен, что и за один раз он сможет удалить нечистоту – как в случае со слюной собаки – этого также будет достаточно (1).

Если вы находитесь в состоянии джунуб (большого осквернения), то вам будет достаточно совершить гусль (принять душ), чтобы избавиться от нечистоты.

А Аллах знает лучше.

АбдульМаннан Низами, студент Даруль Ифта

Чикаго, Иллинойс, США

Проверено и одобрено муфтием Ибрагимом Десаи.

www.daruliftaa.net

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[1] وإن كانت غير مرئية كالبول والخمر، ذكر في «الأصل» ، وقال يغسلها ثلاث مرات ويعصر في كل مرة، فقد شرط الغسل ثلاث مرات، وشرط العصر في كل مرة. وعن محمد رحمه الله في غير رواية الأصول: أنه إذا غسل ثلاث مرات وعصر في المرة الثالثة یطهر.

وفي «القدوري» وما لم یكن مرئية، فالطهارة موكولة إلى غلبة الظن، وقدرنا بالثلاث؛ لأن غلبة الظن يحصل عنده.
وفی الخلاصة: ثم التقدیر لیس بلازم عندنا بالثلاث بل ھو مفوض الی اجتہادہ، ان کان غالب ظنہ انہا تزول بما دون الثلاث یحکم بطہارتہ
وفي «شرح الطحاوي» وإن كانت النجاسة غير مرئية كالبول وأشباه ذلك يغسله حتى يطهر ولا وقت في غسله ووقته سكون قلبه إليه.
وهذا الذي ذكرنا من اشتراط الغسل ثلاث مرات مذهبنا.
وقال الشافعي رحمه الله: إن كانت النجاسة غير مرئية فإنه يطهر بالغسل مرة واحدة الا الا ان یخرج الماء متغیرا
وقد روي عن أبي يوسف رحمه الله کقول الشافعي، فإنه ذكر الحاكم الشهيد رحمه الله في «المنتقى» عنه: إذا غسل مرة واحدة سابغة تطهر۔۔۔
وذكر شمس الأئمة الحلواني رحمه الله في «صلاة المستفتي» أن النجاسة إذا كانت بولاً أو ماءً نجساً وصب الماء عليه كفاه ذلك، ويحكم بطهارة الثوب على قياس قول أبي يوسف رحمه الله، فإنه روي عنه أن الجنب إذا اتزر في الحمام وصب الماء على جسده من حیث الظهر والبطن حتى یخرج عن الجنابة ثم صب الماء على الإزار يحكم بطهارة الإزار، وإن لم يعصره. وقال في رواية أخرى: إذا صب الماء على الإزار وأمرّ الماء يكفيه فوق الإزار فهو أحسن وأحوط، فإن لم يفعل يجزئه.
وفي «المنتقى» شرط العصر على قول أبي يوسف رحمه الله، فقد روى ابن سماعة عنه في الثوب يصيبه مثل قدر الدرهم من البول، فصب عليه الماء صبة واحدة وعصر طهر
[الفتاوی التاتارخانیة، کتاب الطہارة، الفصل الثامن فی تطہیر النجاسات، ج۱، ص٤٥٠، مکتبة زکریا بدیوبند]

قال الامام الشرنبلالی: ”ويطهر متنجس» سواء كان بدنا أو ثوبا أو آنية «بنجاسة» ولو غليظة «مرئية» كدم «بزوال عينها ولو» كان «بمرة» أي غسلة واحدة «على الصحيح» ولا يشترط التكرار لأن النجاسة فيه باعتبار عينها فتزول بزوالها وعن الفقيه أبي جعفر أنه يغسل مرتين بعد زوال العين إلحاقا لها بغير مرئية غسلت مرة وعن فخر الإسلام ثلاثا بعده كغير مرئية لم تغسل ومسح محل الحجامة بثلاث خرق رطبات نظاف مجزئ عن الغسل لأنه يعمل عمله

وقال الشارح الطحطاوی: قوله: «مرئية كدم» المرئية ما يرى بعد الجفاف وغير المرئية ما لا يرى بعده كذا في غاية البيان
قوله: «بزوال عنها» مقيد بما إذا صب الماء عليها أو غسلها في الماء الجاري فلو غسلها في إجانة يطهر بالثلاث إذا عصر في كل مرة كذا في الخلاصة ذكره السيد واعلم أن ما يبقى في اليد من البلة بعد زوال عين النجاسة طاهر تبعا لطهارة اليد في الاستنجاء بطهارة المحل وعروة الإبريق بطهارة اليدين وخف المستنجي إذا كان ما استنجى به يجري عليه
قوله: «رطبات» لعله قيد اتفاقي فإن. اليابس يجتذب الرطوبة أكثر من الرطب وقد يقال إن الرطب يلين بعض ما تجمد من الدم ويحرر
[حاشية الطحطاوي على مراقي الفلاح، کتاب الطہارة، باب الانجاس، ج۱، ص٢٢٦، دار قباء]

[فتاوی محمودیة، کتاب الطہارة، باب الانجاس، ج۵، ص٢٦٢، فاروقیة]
[فتاوی محمودیة، کتاب الطہارة، باب الانجاس، ج۵، ص٢٧٥، فاروقیة]

وَقَالَ الْوَلْوَالِجِيُّ أَيْضًا الْكَلْبُ إذَا أَخَذَ عُضْوَ إنْسَانٍ أَوْ ثَوْبَهُ إنْ أَخَذَ فِي حَالَةِ الْغَضَبِ لَا يَتَنَجَّسُ؛ لِأَنَّهُ يَأْخُذُهُ بِالْأَسْنَانِ وَلَا رُطُوبَةَ فِيهَا، وَإِنْ أَخَذَهُ فِي حَالَةِ الْمِزَاحِ يَتَنَجَّسُ؛ لِأَنَّهُ يَأْخُذُهُ بِالْأَسْنَانِ وَالشَّفَتَيْنِ وَشَفَتَاهُ رَطْبَةٌ فَيَتَنَجَّسُ اهـ.
وَكَذَا ذَكَرَ غَيْرُهُ وَفِي الْقُنْيَةِ رَامِزًا لِلْوَبَرِيِّ عَضَّهُ كَلْبٌ وَلَا يَرَى بَلَلًا لَا بَأْسَ بِهِ يَعْنِي لَا يَجِبُ غَسْلُهُ وَلَا يَخْفَى أَنَّ مَا فِي الْقُنْيَةِ إنَّمَا يَنْظُرُ إلَى وُجُودِ الْمُقْتَضِي لِلنَّجَاسَةِ، وَهُوَ الرِّيقُ سَوَاءٌ كَانَ مُلَاعِبًا أَوْ غَضْبَانًا، وَهُوَ الْفِقْهُ وَقَدْ صَرَّحَ فِي الْمُلْتَقَطِ بِأَنَّهُ لَا يَتَنَجَّسُ مَا لَمْ يَرَ الْبَلَلَ سَوَاءٌ كَانَ رَاضِيًا أَوْ غَضْبَانًا وَفِي الصَّيْرَفِيَّةِ هُوَ الْمُخْتَارُ وَكَذَا فِي التَّتَارْخَانِيَّة وَوَاقِعَاتِ النَّاطِفِيِّ وَغَيْرِهِمَا كَذَا فِي عِقْدِ الْفَوَائِدِ وَفِي خِزَانَةِ الْفَتَاوَى وَعَلَامَةُ الِابْتِلَالِ أَنْ لَوْ أَخَذَهُ بِيَدِهِ تَبْتَلُّ يَدُهُ،
[البحر الرائق، کتاب الطہارة، الطہارة بالدباغ، ج۱، ص۱۰۸، دار الکتاب الاسلامی]

(وسؤر نجس) وهو سؤر الخنزير والكلب وسباع الوحش كالاسد والفهد ونحو ذلك
[فتاوى قاضيخان، کتاب الطہارة، فصل فی الاسار، ج۱، ص۲۵، قدیمی کتب خانہ]

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16.05.2017
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