В чем смысл известного аята (2, 256): «Нет принуждения в религии»? - Ан-Ниса - Мусульманский женский портал

В чем смысл известного аята (2, 256): «Нет принуждения в религии»?

Вопрос:

У меня проблемы с понимаем известного аята: «Нет принуждения в религии…» (2, 256). В чем смысл принуждения в этом контексте? Как применять этот аят по отношению к немусульманам и как применять его к себе?

Ответ:

С именем Аллаха, Милостивого, Милосердного.

Ассаляму алейкум ва рахматуллахи ва баракятух!

Аят, на который вы ссылаетесь, следующий:

لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ

Не должно быть принуждения [в принятии] религии [1]

Ниже приводятся мнения муфассиров (комментаторов) относительно этого аята:

Алляма Ибн Касир (рахимахуллах) пишет в «Тафсир Ибн Касир»:

لا تكرهوا أحدا على الدخول في دين الإسلام فإنه بين واضح جلي دلائله وبراهينه لا يحتاج إلى أن يكره أحد على الدخول فيه، بل من هداه الله للإسلام وشرح صدره ونور بصيرته دخل فيه على بينة، ومن أعمى الله قلبه وختم على سمعه وبصره فإنه لا يفيده الدخول في الدين مكرها مقسورا

«Никто не принуждается к принятию религии Ислама, поскольку ее свидетельства и доводы столь ясны, что нет нужды в принуждении. Тем более, кого Аллах наставит на истину, раскроет его грудь и просветит его взор, тот примет Ислам. А чье сердце Аллах ожесточит, и запечатает его слух и зрение, для того нет пользы в принуждении» (2).

Алляма Фахруддин ар-Рази (рахимахуллах) пишет в «Тафсир аль-Кабир»:

ما بنى أمر الإيمان على الإجبار والقسر، وإنما بناه على التمكن والاختيار

«Порядок (правило) имана (веры) не основан на принуждении, наоборот, он основан на выборе и свободной воле» [3]

Алляма шейх Санауллах Панипатти (рахимахуллах) пишет в «Тафсир аль-Мазхари»:

الإكراه الزام الغير فعلا لا يرضى به الفاعل وذالا يتصور الا فى افعال الجوارح واما الايمان فهو عقد القلب وانقياده لا يوجد بالإكراه- او المعنى لا تكرهوا في الدين فهو اخبار بمعنى النهى- ووجه المنع اما ما ذكرنا انه لا يوجد الايمان بالإكراه فلا فائدة فيه

«Принуждение – это вынужденное действие, с которым человек не согласен (и которое совершает лишь под страхом силы). Оно возможно лишь для физических действий, которые совершают части тела. Иман – это согласие, исходящее из сердца, которое невозможно получить под принуждением. Так что никто не может получить иман (стать мусульманином) посредством принуждения, поэтому нет пользы в принуждении». [4]

Алляма Асируддин аль-Андалуси (рахимахуллах) пишет в «Аль-Бахр аль-Мухит»:

ذكر في سبب نزولها أقوال مضمون أكثرها: أن بعض أولاد الأنصار تنصر، وبعضهم تهود، فأراد آباؤهم أن يكرهوهم على الإسلام، فنزلت

«Причин, по которым был ниспослан этот аят, несколько. Большинство из них можно резюмировать следующим образом: некоторые из детей ансаров перешли в христианство, а некоторые – в иудаизм. Так что их отцы пытались силой заставить их вернуться в Ислам. Поэтому был ниспослан данный аят, что нет принуждения в религии». [5]

Алляма Насируддин аш-Ширази (рахимахуллах) пишет в «Тафсир аль-Байдави»:

الإيمان رشد يوصل إلى السعادة الأبدية والكفر غي يؤدي إلى الشقاوة السرمدية، والعاقل متى تبين له ذلك بادرت نفسه إلى الإيمان طلبا للفوز بالسعادة والنجاة، ولم يحتج إلى الإكراه والإلجاء

«Иман – это истинная вера, которая ведет к вечному преуспеянию. Куфр – это преступление, которое ведет к вечному несчастью. Когда это (сознание этого) становится ясно человеку, он спешит к иману, чтобы получить успех. Поэтому нет нужды в принуждении» [6]

А Аллах Тааля знает лучше.

Абдуль-Маннан Низами, студент Даруль-ифта, Чикаго, США

Проверено и одобрено муфтием Ибрагимом Десаи

www.daruliftaa.net

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[1]  [سورة البقرة، الآية ٢٥٦]

[2]  {لا إكراه في الدين} أي: لا تكرهوا أحدا على الدخول في دين الإسلام فإنه بين واضح جلي دلائله وبراهينه لا يحتاج إلى أن يكره أحد على الدخول فيه، بل من هداه الله للإسلام وشرح صدره ونور بصيرته دخل فيه على بينة، ومن أعمى الله قلبه وختم على سمعه وبصره فإنه لا يفيده الدخول في الدين مكرها مقسورا. وقد ذكروا أن سبب نزول هذه الآية في قوم من الأنصار، وإن كان حكمها عاما

[تفسير ابن كثير، سورة البقرة، الآية ٢٥٦، ج١، ص٤٠٦، قديمي]

[3]  معناه أنه تعالى ما بنى أمر الإيمان على الإجبار والقسر، وإنما بناه على التمكن والاختيار، ثم احتج القفال على أن هذا هو المراد بأنه تعالى لما بين دلائل التوحيد بيانا شافيا قاطعا للعذر، قال بعد ذلك: إنه لم يبق بعد إيضاح هذه الدلائل للكافر عذر في الإقامة على الكفر إلا أن يقسر على الإيمان ويجبر عليه، وذلك مما لا يجوز في دار الدنيا التي هي دار الابتلاء، إذ في القهر والإكراه على الدين بطلان معنى الابتلاء والامتحان، ونظير هذا قوله تعالى: فمن شاء فليؤمن ومن شاء فليكفر

[التفسير الكبير، سورة البقرة، ج٣، ص١٥، دار احياء التراث العربي]

[4]  لا اكراه في الدّين يعنى لا يتصور الإكراه في ان يؤمن أحد إذ الإكراه الزام الغير فعلا لا يرضى به الفاعل وذالا يتصور الا فى افعال الجوارح واما الايمان فهو عقد القلب وانقياده لا يوجد بالإكراه- او المعنى لا تكرهوا في الدين فهو اخبار بمعنى النهى- ووجه المنع اما ما ذكرنا انه لا يوجد الايمان بالإكراه فلا فائدة فيه

[التفسير المظهري، سروة البقرة، ج١، ص٣٥٢، دار الكتب العلمية]

 [5]  لا إكراه في الدين ذكر في سبب نزولها أقوال مضمون أكثرها: أن بعض أولاد الأنصار تنصر، وبعضهم تهود، فأراد آباؤهم أن يكرهوهم على الإسلام، فنزلت… وقيل: لا يكره على الإسلام من خرج إلى غيره. وقال أبو مسلم، والقفال: معناه أنه ما بنى تعالى أمر الإيمان على الإجبار والقسر، وإنما بناه على التمكن والاختيار، ويدل على هذا المعنى أنه لما بين دلائل التوحيد بيانا شافيا، قال بعد ذلك: لم يبق عذر في الكفر إلا أن يقسر على الإيمان ويجبر عليه، وهذا ما لا يجوز في دار الدنيا التي هي دار الابتلاء، إذ في القهر والإكراه على الدين بطلان معنى الابتلاء. ويؤكد هذا قوله بعد: قد تبين الرشد من الغي

[تفسير البحر المحيط، سورة البقرة، ج٢، ص٤٥١، دار احياء التراث العربي]

[6]  ودلت الدلائل على أن الإيمان رشد يوصل إلى السعادة الأبدية والكفر غي يؤدي إلى الشقاوة السرمدية، والعاقل متى تبين له ذلك بادرت نفسه إلى الإيمان طلبا للفوز بالسعادة والنجاة، ولم يحتج إلى الإكراه والإلجاء

[تفسير البيضاوي، سورة البقرة، ج١، ص٥٥٧، دار الفكر]

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