В каком порядке нужно восполнять пропущенные намазы? - Ан-Ниса - Мусульманский женский портал

В каком порядке нужно восполнять пропущенные намазы?

Вопрос:

Иногда случается, что я пропускаю мой фаджр-намаз, поскольку не получается проснуться вовремя. Недавно я узнал, что человек, который пропустил менее шести намазов (т.н. сахибу-тартиб) должен совершить свои када (долговые) намазы перед текущими. Я не знал об этом, так что я всегда совершал долговые намазы после обязательных. Означает ли это, что все мои намазы недействительны?

Ответ:

Ассаляму алейкум ва рахматуллахи ва баракятух!

Шариат подчеркивает большую ценность своевременного выполнения намазов. Существует следующий хадис:

يُّ العَمَلِ أَحَبُّ إِلَى اللَّهِ؟ قَالَ: «الصَّلاَةُ عَلَى وَقْتِهَ

Пророка (мир ему и благословение) спросили: «Какое деяние самое ценное для Аллаха?» Он ответил: «Совершение молитв в положенное время» (1).

Сахибу-тартиб – это человек, который пропустил менее шести намазов. Если человек пропустил менее шести намазов, он должен совершить долговой (када) намаз прежде чем он совершит следующую молитву. Например, если человек пропустил намаз фаджр. Тогда он должен сделать када фаджр-намаза прежде чем он совершит намаз зухр. Если он не восполнит фаджр-намаз перед совершением зухра (при условии, что его положение не соответствует двум исключениям, которые будут упомянуты ниже), действительность его зухр-намаза будет приостановлена (мукуф). Если он восполнит фаджр после этого, действительность его зухр-намаза будет аннулирована, и он будет должен совершить его еще раз после выполнения долгового намаза фаджр. Если он совершает зухр и аср намазы без восполнения фаджра, их действительность также будет приостановлена.  Опять-таки, если он после них восполнит фаджр, ему следует повторить эти намазы. Это правило одинаково для максимум четырех намазов после пропущенного фаджр-намаза. То есть, если этот человек сначала совершил намазы зухр, аср, магриб и иша, а потом восполнил фаджр, он должен будет их восполнить в том же порядке. Однако, если он совершит намазы зухр, аср, магриб, иша и фаджр следующего дня, а потом уже восполнит фаджр прошлого дня, ему не нужно будет восполнять эти намазы, они будут считаться действительными. Иными словами, через пять намазов после пропущенного фаджра, те молитвы, чья действительность была приостановлена, будут снова действительными, если восполнение пропущенного фаджра совершается после них. Если же фаджр восполняется в любое время до этого, приостановленные молитвы будут аннулированы, и их нужно будет восполнить в определенном порядке.

Если два исключения из этого правила:

1. Если человек ограничен во времени – то есть, если он сначала совершит долговой намаз, то на текущий намаз уже времени не останется, ему можно сначала совершить текущий намаз, а уж потом долговой.

2. Аналогично, если человек забудет, что ему следует выполнить долговой намаз, и он сразу совершит текущий намаз, ему не нужно будет повторять текущий намаз после совершения када-намаза (2).

 

А Аллах знает лучше.

 

Абдулла Гадаи, Мичиган, США.

Проверено и одобрено муфтием Ибрагимом Десаи
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[1] صحيح البخاري (1/ 112)
[2] الهداية في شرح بداية المبتدي (1/ 72)
ومن فاتته صلاة قضاها إذا ذكرها وقدمها على فرض الوقت » والأصل فيه أن الترتيب بين الفوائت وفرض الوقت عندنا مستحق وعند الشافعي رحمه الله مستحب، لأن كل فرض أصل بنفسه فلا يكون شرطا لغيره، ولنا قوله عليه الصلاة والسلام » من نام عن صلاة أو نسيها فلم يذكرها إلا وهو مع الإمام فليصل التي هو فيها ثم ليصل التي ذكرها ثم ليعد التي صلى مع الإمام » » ولو خاف فوت الوقت يقدم الوقتية ثم يقضيها » لأن الترتيب يسقط بضيق الوقت وكذا بالنسيان وكثرة الفوائت كيلا يؤدي إلى تفويت الوقتية ولو قدم الفائتة جاز لأن النهي عن تقديمها لمعنى في غيرها بخلاف ما إذا كان في الوقت سعة وقدم الوقتية حيث لا يجوز لأنه أداها قبل وقتها الثابت بالحديث » ولو فاتته صلوات رتبها في القضاء كما وجبت في الأصل » لأن النبي عليه الصلاة والسلام شغل عن أربع صلوات يوم الخندق فقضاهن مرتبا ثم قال » صلوا كما رأيتموني أصلي » » إلا أن تزيد الفوائت على ست صلوات » لأن الفوائت قد كثرت » فيسقط الترتيب فيما بين الفوائت » نفسها كما سقط بينها وبين الوقتية وحد الكثرة أن تصير الفوائت ستا لخروج وقت الصلاة السادسة وهو المراد بالمذكور في الجامع الصغير وهو قوله » وإن فاتته أكثر من صلاة يوم وليلة أجزأته التي بدأبها » لأنه إذا زاد على يوم وليلة تصير ستا وعن محمد رحمه الله أنه اعتبر دخول وقت السادسة والأول هو الصحيح لأن الكثرة بالدخول في حد التكرار وذلك في الأول ولو اجتمعت الفوائت القديمة والحديثة قيل تجوز الوقتية مع تذكر الحديثة لكثرة الفوائت وقيل لا تجوز ويجعل الماضي كأن لم يكن زجرا له عن التهاون ولو قضى بعض الفوائت حتى قل ما بقي عاد الترتيب عند البعض وهو الأظهر فإنه روي عن محمد رحمه الله فيمن ترك صلاة يوم وليلة وجعل يقضي من الغد مع كل وقتية فائتة فالفوائت جائزة على كل حال والوقتيات فاسدة إن قدمها لدخول الفوائت في حد القلة وإن أخرها فكذلك إلا العشاء الأخيرة لأنه لا فائتة عليه في ظنه حال أدائها » ومن صلى العصر وهو ذاكر أنه لم يصل الظهر فهي فاسدة إلا إذا كان في آخر الوقت » وهي مسئلة الترتيب
الجوهرة النيرة على مختصر القدوري (1/ 67)
(قوله: فإن فاتته صلوات رتبها في القضاء كما وجبت في الأصل) أي عند قلة الفوائت بدليل قوله فيما بعد إلا أن تزيد الفوائت على ست صلوات والدليل على وجوب الترتيب أن «النبي — صلى الله عليه وسلم — شغل يوم الخندق عن أربع صلوات فقضاهن مرتبا ثم قال صلوا كما رأيتموني أصلي» وهذا أمر بالترتيب وإنما لم يقل صلوا كما أصلي أو كما صليت؛ لأنه ليس في وسع أحد أن يصلي كما صلى في الخشوع، والأربع صلوات التي شغل عنها يوم الخندق الظهر والعصر والمغرب والعشاء فقضاهن بعد هوى من الليل أي طائفة من الليل وهي نحو من ثلثه أو ربعه فأمر بلالا فأذن ثم أقام فصلى الظهر ثم أقام فصلى العصر ثم أقام فصلى المغرب ثم أقام فصلى العشاء. (قوله: إلا أن تزيد الفوائت على ست صلوات) مراده أن تصير الفوائت ستا ودخل وقت السابعة فإنه يجوز أداء السابعة وفيه إشكال وهو أن بدخول السابعة لا تزيد الفوائت على ست وإنما ذلك بخروج وقت السابعة والجواب أن هذا من باب إطلاق اسم الأغلب على الكل فإن الأغلب أن خروج السادسة لا يكون إلا بدخول السابعة وعند دخول السابعة تحقق فوات الست والسابعة بعرضية أن تفوت وقيل معناه إلا أن تصير الفوائت ستا وتحمل الزيادة حتى قل ما بقي عاد الترتيب عند البعض وهو الأظهر، وقال بعضهم لا يعود وهو اختيار أبي حفص؛ لأن الساقط لا يتصور عوده قال صاحب الحواشي وهو الأصح والتوفيق بينهما أنه إذا قضاها مرتبا عاد الترتيب وإن لم يقضها مرتبا لم يعد بيانه إذا ترك صلاة شهر وقضاها إلا صلاة أو صلاتين ثم صلى وقتية وهو ذاكر للباقي قال بعضهم لا يجوز وإليه مال أبو جعفر.
مراقي الفلاح شرح نور الإيضاح (ص: 171)
«والترتيب بين الفائتة» القليلة وهي ما دون ست صلوات «و» بين «الوقتية» المتسع وقتها مع تذكر الفائتة لازم «و» كذا الترتيب «بين» نفس «الفوائت» القليلة «مستحق» أي لازم لأنه فرض عملي يفوت الجواز بفوته والأصل في لزوم الترتيب قوله صلى الله عليه وسلم: «من نام عن صلاة أو نسيها فلم يذكرها إلا وهو يصلي مع الإمام فليصل التي هو فيها ثم ليقض التي تذكرها ثم ليعد التي صلى مع الإمام» وهو خبر مشهور وتلقنه العلماء بالقبول فيثبت به الفرض العملي ورتب النبي صلى الله عليه وسلم قضاء الفوائت يوم الخندق «ويسقط» الترتيب «بأحد ثلاثة أشياء» الأول «ضيق الوقت» عن قضاء كل الفوائت وأداء الحاضرة للزوم العمل بالمتواتر حينئذ لأن العمل بالمشهور يستلزم إبطال القطعي وهو لا يعمل به إلا مع إمكان الجمع بينهما بسعة الوقت وليس من الحكمة إضاعة الموجود في طلب المفقود بضيق الوقت «المستحب» لأنه لا يلزم من مراعاة الترتيب وقوع حاضرة ناقصة فيتغير به حكم الكتاب فيسقط بضيق الوقت المستحب الترتيب ولا يعود بعد خروجه «في الأصح» مثاله لو اشتغل بقضاء الظهر يقع العصر أو بعضه في وقت التغير فيسقط الترتيب في الأصح والعبرة لضيقه عند الشروع فلو شرع في الوقتية متذكر الفائتة وأطالها حتى ضاق الوقت لا تجوز إلا أن يقطعها ثم يشرع فيها ولو شرع ناسيا والمسألة بحالها فتذكر عند ضيق الوقت جازت الوقتية ولو تعددت الفائتة والوقت يسع بعضها مع الوقتية سقط الترتيب في الأصح كما أشرنا إليه لأنه ليس الصرف إلى هذا البعض من الفوائت أولى منه للآخر كما في الفتح «و» الثاني «النسيان» لأنه لا يقدر على الإتيان بالفائتة مع النسيان: {لا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلَّا وُسْعَهَا} [البقرة: 286] ولأنه لم يصر وقتها موجودا بعدم تذكرها فلم تجتمع مع الوقتية «و» الثالث «إذا صارت الفوائت» الحقيقية أو الحكمية «ستا» لأنه لو وجب الترتيب فيها لوقعوا في حرج عظيم وهو مدفوع بالنص والمعتبر خروج وقت السادسة في الصحيح لأن الكثرة بالدخول في حد التكرار وروى بدخول وقت السادسة لأن الزائدة على الخمس في حكم التكرار ومثال الكثرة الحكمية سنذكرها لصلاته خمسا متذكرا فائتة لم يقضها حتى خرج وقت السادسة من المؤديات متذكرا وكما سقط الترتيب فيما بين الكثيرة والحاضرة سقط فيما بين أنفسها على الأصح وقيدناها بكونها ستا «غير الوتر فإنه لا يعد مسقطا» في كثرة الفوائت بالإجماع أما عندهما فظاهر لقولهما بأنه سنة ولأنه فرض عملي عنده وهو من تمام وظيفة اليوم والليلة والكثرة لا تحصل إلا بالزيادة عليها من حيث الأوقات أو من حيث الساعات ولا مدخل للوتر في ذلك بوجه «وإن لزم ترتيبه» مع العشاء والفجر وغيرهما كما بيناه «ولم يعد الترتيب» بين الفوائت التي كانت كثيرة «بعودها إلى القلة» بقضاء بعضها لأن الساقط لا يعود في أصح الروايتين وعليه الفتوى وترجيح عود الترتيب ترجيح بلا مرجح «ولا» يعود الترتيب أيضا «بفوت» صلاة «حديثة» أي جديدة تركها «بعد» نسيان «ست قديمة» ثم تذكرها «على الأصح فيهما» أي الصورتين لما ذكرنا وعليه الفتوى ثم فرع غلى لزوم الترتيب في أصل الباب بقوله «فلو صلى فرضا ذاكرا الفائتة ولو» كانت «وترا فسد فرضه فسادا موقوفا» يحتمل تقرر الفساد ويحتمل رفعه بينه بقوله «فإن» صلى خمس صلوات متذكرا في كلها تلك المتروكة وبقيت في ذمته حتى «خرج وقت الخامسة مما صلاه بعد المتروكة ذاكرا لها» أي للمتروكة «صحت جميعها» عند أبي حنيفة رحمه الله لأن الحكم وهو الصحة مع العلة وهي الكثرة يقترنان والكثرة صفة هذا المجموع لأن الفاسد في حكم المتروك فكانت المتروكات ستا حكما واستندت الصفة إلى أولها فجازت كلها كتعجيل الزكاة يتوقف كونها فرضا على تمام الحول وبقاء بعض النصاب فإذا تم على نمائه كان التعجيل فرضا وإلا كان نفلا «فلا تبطل» الخمس التي صلاها متذكرا للفائتة «بقضاء» الفائتة «المتروكة بعده» أي بعد خروج وقت الخامسة

Фатава Махмудийя, том 7, с . 376-381

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